यषपाल की कहानियों का समीक्षात्मक मूल्यांकन

 

डाॅ. भवानी प्रधान

अतिथि व्याख्या, शास. दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगाँव (..)

*Corresponding Author E-mail: sharma.vivek.786.vs@gmail.com

 

ABSTRACT:

यषपाल हिंदी साहित्य के सषक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। साहित्य- साधना के क्षेत्र में कथा-सृजन की दृष्टि से यषपाल का विरल- विराट व्यक्तित्व है। समाज की वास्तविकताओं के प्रति प्रबुद्ध पाठकों को जागृत करना उनका मुख्य ध्येय रहा है। समाज की विडंबनाओं से आक्रोषपूर्ण अभिव्यंजना उनकी रचना प्रक्रिया रही है। सामान्य जन-जीवन की सुख-दुःख, हर्ष-पीड़ा, त्रासदी, विभाजन का दंष, राजनीतिज्ञ कुटिलता आदि से भली- भाँति परिचित यषपाल का लेखन-कार्य यथार्थ की ठोस ज़मीन पर खड़ा है। कथ्य की दृष्टि-पथ पर रखकर ही उन्होंने अपनी कहानियों का संयोजन किया है।

 

KEYWORDS: समाज की वास्तविकताओं  समाज की विडंबनाओं राजनीतिज्ञ कुटिलता.

 

 


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यषपाल हिंदी साहित्य के एक मूर्धन्य एवं युग-प्रवर्तक साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। इनकी रचनाएँ भारतीय जन-मानस एवं उनकी भावनाओं के साक्षात् प्रतिरूप हैं। आधुनिक साहित्यकारों की जिस श्रेणी में यषपाल की गणना की जाती है, वह हिंदी साहित्य-जगत् में मुंषी प्रेमचंद के बाद पहला स्थान है। यषपाल ने अपनी कहानी-यात्रापिंजरे की उड़ान से शुरू करके लैंपषेड तक लगभग 207 कहानियाँ लिखी, जिसमें समाज के सभी समस्याओं को अपनी कहानियों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया ळें

 

उनका लेखन समाज-कल्याण की भावना को एक विषेष दिषा में आँकने लगता है। इनकी रचनाओं में समाज तथा व्यक्ति के पारस्परिक संबंधों का समाजवादी दृष्टि से चित्रण हुआ है। डाॅ. नगेन्द्र का कथन है श्री यषपाल हिंदी के उन गल्प लेखकों में से हैं, जिनकी पारदृष्टि समाज के नाना स्तरों, जीवन की विविध स्थितियों और मानव-मन की गुप्त मनोवृŸिायों का उद्घाटन करने की अद्भुत क्षमता रखती है।’’1

 

यषपाल ने समाज में चल रहे धार्मिक अंधविष्वास रूढ़िगत परंपराओं तथा पौराणिक मान्यताओं पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने धार्मिक आडंबरों का घोर विरोध किया है। धर्म विषयक कहानियाँ जीवन की उन मान्यताओं का उपहास है, जहाँ जीवन कोल्हू के बैल की भाँति ठिठका हुआ है। रतौंधी रोग के कारण मानव प्रकाष को भी अँधेरा मानता है। धर्म के जाल में बद्ध रूढ़ियों और अंधविष्वासों की ठोकरें खाता हुआ पतन के गर्त में जा गिरता है। इन कहानियों के द्वारा खोखली धार्मिकता से मुक्त होकर व्यक्ति बौद्धिकता और नवीनता के वायुमंडल में वास ले सके। यषपाल ने उचित पैमाने से नापकर बात की सच्चाई और गहराई तक पहुँचाने का प्रयास किया है।

 

अनमेल विवाह जैसे विषय (समस्या) अनुभवी एवं जागरूक लेखक की दृष्टि से नहीं बच सका। पुरुष भगवान नामक कहानी का पात्र बूढ़ा गोरखा चैकीदार की कथा है, समाज की ऐसी मर्यादाएँ उन्हें बेबुनियाद लगती हैं, जो पुरुष प्रधान समाज ने अपने हक में बनाई है। क्या सारे नैतिक-अनैतिक धर्म की तराजू केवल नारी के लिए है। जब बूढ़े के साथ ब्याह की गाँठ बंधी उस समय अनाचार का प्रष्न नहीं था।’’2 बूढ़े पति के प्रति उसमें समर्पण है और प्रेम, केवल विवषता है ज़िंदगी को जैसे-तैसे ढोने की।

 

मंगला कहानी में यषपाल ने नारी-जीवन की विवषता को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। हिंदू समाज में विवाह का संबंध जाति-बिरादरी की भावनाओं के घेरे में जकड़े हुए हैं। अल्मोड़ा की रूपवान मंगला की शादी लक्ष्मीदŸ से होती है। मंगला पति को परमेष्वर मानकर ससुराल पहुँची, परंतु वहाँ तो विपरीत परिस्थिति थी। सौतेली सास की अमानवीय व्यवहार सहते-सहते दुःखी हो गई थी। पुरुष प्रधान समाज में जाने कितने ही फूलों को खिलने से पहले ही कुचल दिया जाता है। मंगला निराष होकर अपने भाग्य के खेल को देखने को मजबूर है। पिता के घर से कन्या की डोली उठती है और पति के घर से अर्थी। पति के घर आश्रय नहीं मिला तो विवष होकर शेरुआ के साथ चली आई। मंगला फुटबाल की भाँति इधर-उधर टकराती हुई अनेक ठोकरों के नीचे आती है। ये सरकारी पिट्टू भी बहती गंगा में हाथ धोने को उतावले हैं। मंगला कुछदिन पटवारी साहब की निगरानी में रही और वे भी मंगला के लिए उचित स्थान की खोज में उसे होटलों और सिनेमा के चक्कर लगवाते रहे।’’3 मंगला का जीवन तो अभिषाप बन गया।

 

भारतीय समाज के पारिवारिक जीवन में पर्दा-प्रथा का अस्तित्व बहुत प्राचीन परंपरा है। इस प्रथा के कारण नारियों की स्वतंत्रता पर अनेक कुठाराघात हुए हैं तथा नारियों का संसार भी सीमित परिधि में आवृŸ होकर रह गया। पर्दा मनुष्य के शोषण और नर के एकाधिकार का प्रतीक माना जाता है। पर्दे के कारण मन की दबी हुई इच्छाओं को कुंठित बना दिया जाता है। पर्दा-प्रथा को ध्यान में रखते हुए यषपाल ने अनेक कहानियाँ लिखी, जिनमें प्रमुख हैं-‘वो दुनिया’, जबर्दस्ती’, समाधि’, धूल’, गवाही’, फूलों का कुर्ता’, कुल मर्यादा इन सभी कहानियों में पर्दा-प्रथा की विकृतियों का यथार्थ चित्रण हुआ है। बदलते हुए परिवेष में परंपरागत पर्दा-प्रथा को त्यागना ही श्रेश्ठकर है। पुरानी रूढ़ियों का पालन बुद्धिमता का लक्षण नहीं है। जो पर्दा जीवन में सकने वाली किरण को रोके है, उस पर जीवन निछावर कर देने से क्या लाभ।’’4

 

यषपाल ने अपनी कहानियों में भारतीय विधवाओं के जीवन की दयनीय स्थिति पर सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि डाली है। कहानीवैष्णवी में पाँच वर्ष की कन्या पोदी अपने आठ वर्षीय पति गणेष की मृत्यु के बाद आजीवन वैधव्य धारण कर अंधकारमय जीवन को घुटते रहने को विवष की जाती है। वह अबोध बालिका पोदी के माँ-बाप ने कन्या के वैधव्य के आघात से सिर पीट लिया। वे अपने समाज की रीति को दैव का विधान मानकर चुप रह गए।’’5 लेखक ने प्राचीन रूढ़िवादी परंपरा पर ऊँगली उठाई है।

 

यषपाल ने भैरवी कहानी-संग्रह की कहानी न्याय का दंड में अवर्णों की दयनीय सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है। इस कहानी में डूमने जाति का गरीब धक्कू की व्यथा-कथा है। पुरखों से ही मिट्टी के बर्तन से खाना खाते चले रहे थे। धक्कू अपनी खून-पसीने की कमाई में से कुछ रुपए बचाकर एक काँसे की थाली खरीद लेता है। जमींदार लोगों को जब पता चलता है, तो वे क्रोध से आगबबूला हो जाते हैं। वे नहीं सहन कर सकते कि डूमना जाति का धक्कू उनकी तरह थाली में भोजन करे। धक्कू डूमने काँसे की थाली में खाने लगे तो ठाकुर, ब्राह्मण क्या मिट्टी के बर्तनों में खाएँगे ? हमारे यहाँ ऐसा अनर्थ कभी नहीं हुआ, हो सकेगा।’’6 इसी अपराध के कारण धक्कू की थाली तोड़ दी जाती है। झोपड़ी के किवाड़ भी तोड़ कर फूँक दिए जाते हैं। धक्कू और उसके माता-पिता के ऊपर लाठियाँ चलाई जाती है। क्या अपराध था इन गरीबों का, यही कि ये अन्य लोगों की तरह थाली में खाने के इच्छुक हो गए थे।

 

हुकूमत का जुनून कहानी बज्रबहादुर अड़तालीस गाँव का जागीरदार है। जागीर की निरंकुष मादक शक्ति ने उसकी मानवीय भावनाओं को समाप्त कर उसे व्यभिचारी बना दिया है। जागीरदारी में किस तरह से रक्षक कहलाने वाला भक्षक बना हुआ था और हुकूमत के जुनून में गाँव के गरीब लोग कैसे-कैसे जुल्म सहने को विवष थे। जमींदार की स्थिति वही है, जो एक निर्दयी क्रूर हिंसक षिकारी की होती है। षिकार को छटपटाते देखकर उसे दया नहीं आती, बल्कि और क्रूरतावष दबोच लेने को उतावला होता है। इस गाँव में दया है, धर्म नाम की कोई चीज है, केवल अंधा कानून है, जिसे मानने के लिए सब मजबूर हैं।

 

मन की पुकारकहानी में अंधश्रद्धा को दर्षया गया है। इस कहानी का नायक ठाकुर बुन्दासिंह देवी की कृपा से अपने आपको अजेय समझता है। वह दस वर्षों से देवी की कृपा पर पूर्ण विष्वास करता है। बुन्दासिंह में जहाँ चोरी करना, डाका डालना तथा खून करने के साथ-साथ उसमें दया, करुणा एवं सहानुभूति जैसे मानवीय गुण भी विद्यमान हैं। एक तरफ तो अमीरों को लूटता है, दूसरी ओर दीन-दुखियों तथा असहाय लोगों की सेवा करता है। इस तरह अनेक प्रकार की समस्याओं का चित्रण इनकी रचनाओं में देखने को मिलती है।

 

यषपाल ने आर्थिक विषमता संबंधी कहानियों की ओर भी प्रकाष डाला है। पूँजीवादी समाज में अर्थ-संग्रह का लोभ पूँजीपति तथा शोषक वर्ग का होता है। मक्खी या मकड़ी कहानी रिष्वत के भ्रष्टाचार पर प्रतीकात्मक पद्धति से व्यंग्यात्मक प्रकाष डालती है। रिष्वत इस तरह समाज में फैल चुका है, जैसे यह मकड़जाल चारों और से समाज को आवृŸ किए हुए हैं। इन कहानियों के कथ्य से स्पष्ट है कि समाज में होने वाली अर्थव्यवस्था विषमता धांधलेबाजी को देखते हुए भी मनुष्य उसी ओर आकृष्ट होता है। वह पेट भरने के लिए अन्याय झूठ और चोरी का सहारा लेना ही उचित समझता है।’’7 सीमित परिवेष के धरातल पर रचित आर्थिक समस्याओं से ग्रस्त कहानियाँ व्यंजित करती है कि घरेलू पारिवारिक वातावरण में अर्थाभाव के कारण व्यक्ति को किन-किन शारीरिक मानसिक यातनाओं को सहन करना पड़ता है। कोकला डकैत’, हवाखोर’, मोटरवाली’, कोयलेवाली आदि कहानियों की नायिकाएँ अपने उदर की भूख मिटाने के लिए शरीर तक का विक्रय करने को दमित वासना से आक्रांत पुरुष जब निम्नवर्ग की स्त्रियों पर प्यार की बौछार लुटाना चाहते हैं, तो इस सत्य का अनावरण होता है कि कोयलेवाली आदि स्त्रियाँ आर्थिक परेषानी से तंग आकर केवल रुपए के कारण ही उनकी ओर आकर्षित होती है। चाय वाले बाबू ने मल्की को सोने की जंजीर दी है। मैं भी सोने की कोई चीज लूँगी बुढ़ापे में क्या खाऊँगी।’’8 यषपाल ने बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से अपनी कहानियों में सभी प्रकार की समस्याओं का चित्रांकन किया है।

 

निष्कर्षः

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यषपाल ही सही मायने में जनसाधारण के लिए हिंदी कथा-साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। यषपाल की सबसे बड़ी विषेषता यह है कि जिस जीवन को जिया, जिन परिस्थितियों को भोगा, उसी का अंकन कहानियों के माध्यम से कर दिया। यही अनुभूति उनकी कहानियों को जीवंत रूप प्रदान करती हैं। विषय चाहे धार्मिक अंधविष्वास, रूढ़िवादी परंपरा, राजनीतिक स्वार्थ का हो, किसी भी स्थिति में दिखावा या आडंबर परिलक्षित दिखाई नहीं देता।

 

संदर्भ-ग्रंथः

नगेन्द्र यषपालः अभिनंदन ग्रंथ. पटियालाः पंजाब भाषा विभाग, 1956, पृ. 11.

शर्मा, रामनिवास. यषपाल की कहानी दृष्टि और रचना प्रक्रिया. दिल्ली: निर्मल पब्लिकेषन, संस्करण 2002, पृ. 46.

यषपाल. धर्मयुद्ध. इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाषन, संस्करण 1976, पृ. 115.

यषपाल. तर्क का तूफान. लखनऊ: विप्लव कार्यालय, संस्करण 1956, पृ. 40.

यषपाल. खच्चर और आदमी. लखनऊ: विप्लव कार्यालय, संस्करण 1975, पृ. 10.

यषपाल. भैरवी. इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाषनत्र 1976, पृ. 120-21.

गुप्त, सरोज यषपाल का व्यक्तित्व कृतित्व. अजमेर: अनुराग प्रकाषन, 1970, पृ. 191.

यषपाल. मोटरवाली कोयले वाली. इलाहाबादः लोकभारती प्रकाषन, 1977, पृ. 60.

 

 

 

Received on 27.10.2018            Modified on 17.11.2018

Accepted on 05.12.2018 © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):543-546.